त्वचा का रंग
हमारे देश में गोरा व्यक्ति ही सुंदर कहलाता है , कोई भी विवाह का विज्ञापन देख लीजिये, सभी को गोरी सुन्दर लड़की ही चाहिए ; बाकि सब गुण इस एक गुण के आगे फीके पड़ जाते हैं।
दुर्भाय की बात यह है कि हमारी सोच ही विकृत है , सांवले इंसान को हम हीन दृष्टि से देखते हैं, उसे गन्दा मानते हैं, उसकी योग्यता को नकारते हैं।
सरादा मुरलीधरन 1990 बैच की एक वरिष्ठ IAS अफसर जो केरेला में चीफ सेक्रेटरी के पद पर रह चुकी हैं , उन्हें भी उनके सांवले रंग के चलते भेदभाव का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि जब वे केवल चार बरस की थीं, उन्होंने अपनी माँ से कहा,” माँ, क्या मैं फिर से जन्म ले कर एक गोरी सुन्दर लड़की बन कर पैदा हो सकती हूँ?
ज़रा सोचिये क्या मनःस्थिति रही होगी उस बच्ची की ?
आज भी गर्भवती महिलाओं को सफ़ेद वस्तुएं खाने को कहा जाता है, बच्चा गोरा पैदा होगा ; चाय न पियो, संतान काली होगी; और यह किसी पिछड़े वर्ग की बात नहीं है,
मसाबा गुप्ता एक जानी मानी डिज़ाइनर हैं ,किन्तु हैं सांवली , उन्हें प्रेगनेंसी के समय कहा गया सफ़ेद रसगुल्ले खाओ, दूध पियो, सफ़ेद फल सब्ज़ियां खाओ ताकि तुम्हारी संतान साफ़ रंग की पैदा हो।
बिपाशा बासु, राधिका अप्ते , प्रियंका चोपड़ा , सभी श्यामल रंग की हैं , इन सब को फ़िल्मी दुनिया में पहचान बनाने में अपने सांवले रंग के चलते काफी ज़्यादा मेहनत करनी पड़ी, किन्तु कहते हैं न कि योग्यता सदा त्वचा के रंग से श्रेष्ठ होती है।ओमपुरी जी जीता जागता उद्धाहरण हैं इस बात का , उनके सर्वश्रेष्ठ अभिनयके आगे उनके चेचक के दाग वाला चेहरा जैसे छुप ही जाता था।
मनुष्य की चमड़ी का रंग एक जटिल विशेषता है जो कई जीनों और पर्यावरण के कारकों के बीच परस्पर क्रिया के परिणामस्वरूप निर्धारित होती है।
त्वचा का रंग के लिए एक नहीं बल्कि कई जीनों द्वारा निर्धारित किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक जीन त्वचा के रंग पर असर डालती है। इन जीनों के मिलेजुले ताल मेल से ही त्वचा का रंग निर्धारित होता है।
पर्यावरणीय कारक– जैसे कि सूर्य की किरणें, त्वचा के रंग को प्रभावित करती हैं। सूर्य की किरणें मेलेनिन के उत्पादन को बढ़ावा देती हैं, जिससे त्वचा का रंग गहरा हो जाता है।मेलेनिन सूरज से आने वाली UV किरणों से त्वचा की गहरी परतों को बचाता है , इसीलिए जो लोग ज़्यादा धूप में काम करते हैं वे सांवले हो जाते हैं। या यूँ कहें कि आराम की ज़िंदगी जीने वाले, जिन्हें कड़ी धूप व् मिट्टी धूल में मेहनत मशक्कत नहीं करनी पड़ती उनका रंग साफ़ रहता है।
त्वचा का रंग क्या है?-
त्वचा का रंग मेलेनिन नामक पिगमेंट के कारण होता है, जो त्वचा में पाई जाने वाली कोशिकाओं द्वारा उत्पादित किया जाता है।
इन कोशिकाओं को मेलेनोसाइट्स कहते हैं।
मेलेनिन दो प्रकार के होते हैं:
यूमेलेनिन और फियोमेलेनिन।
यूमेलेनिन त्वचा को भूरा या काला रंग देता है, जबकि फियोमेलेनिन त्वचा को लाल या पीला रंग देता है।
त्वचा के रंग –
– फेयर स्किन: यह त्वचा का रंग हल्का होता है और इसमें कम मेलेनिन होता है।
– डार्क स्किन: यह त्वचा का रंग गहरा होता है और इसमें अधिक मेलेनिन होता है।
– ऑलिव स्किन: यह त्वचा का रंग मध्यम होता है और इसमें यूमेलेनिन और फियोमेलेनिन दोनों होते हैं।
और यह गुण मिलता है विरासत में, यानी यदि आपके मातापिता व् पूर्वज़ गहरे रंग के हैं तो जीन्स के अनुसार आप का रंग भी सांवला ही होगा।
हाँ यदि आपको गोरेपन की जीन्स विरासत में मिली हैं , किन्तु आप कड़ी धुप में मेहनत मशक्क़त का काम करते हैं तो आप सूर्य की किरणों से टैनिंग के कारण गहरे रंग के हो जायेंगे, ऐसे व्यक्ति गोर निकल सकते हैं टैनिंग हटने के बाद।
त्वचा के रंग का महत्व-
त्वचा का रंग एक महत्वपूर्ण विशेषता है जो व्यक्ति की पहचान और संस्कृति को दर्शाता है।जिस प्रदेश में तेज़ धूप निकलती है,जो लोग धूप में शारीरिक मेहनत का काम करते हैं उनका रंग गहरा हो जाता है।
अतः त्वचा का रंग, खाल के स्वास्थ्य और सूर्य की किरणों के प्रभाव को भी दर्शाता है।ये कहना सही होगा कि मेलेनिन आपकी त्वचा की रक्षा करता है, सूर्य की हानिकारक किरणों से !
